बिजनेस करना है तो यह कहानी जरुर पढ़े. 1000X1000 फार्मूला

आज हम देखते है बिजनेस करना हो तो घर से बहोत लोगो को प्रोत्साहन नहीं मिलता| हम मिडिल क्लास फॅमिली से आने वाले लोग हमेशा नोकरी को अहमियत देते है| बिजनेस करना एक पेशंस का काम है| यह हर किसी के बस की बात नहीं| अगर आप में पेशंस है तो आप इसमे आने वाली हर मुश्किल का सामना डटकर कर सकते हो| आज बिज़नेस से जुडी एक कहानी आप से शेयर करने जा रहा हु आशा है आपको पसंद आएगी|

हमारे क्लास का सबसे होशियार लड़का था. हम सब उसे श्री कहकर बुलाते थे. वह हमेशा क्लास के साथ साथ स्कूल में भी टॉप करता था. इसी वजह से मुझे उसकी इर्षा होती थी पर एक होशियार लड़का होने की वजह से मैंने उसके साथ दोस्ती कर ली थी.  एक और दोस्त था जिसका नाम प्रशांत था. वह श्री से बिलकुल अपोजिट था. मतलब क्लास में सबसे पीछे से फर्स्ट आने वाला.  वह हर साल जैसे तैसे पास हो जाता था. और ऊपर के क्लास में ग्रेस लेकर आ जाता. प्रशांत के पापा का किराना शॉप था. उसका शॉप मेंरे घर से बहोत पास होने की वजह से उसके दुकान में किरना  लेने हमेशा मै अपने पापा के साथ जाता था. ईसी के चलते मेरी दोस्ती उसके साथ हो गई थी. हर रोज शाम के वक्त दुकान में उसके पापा को वो  किराना देने में हात बटाता था. क्लास में सब लोग उसे दुकानदार कहकर चिढाते थे.

हमारे वक्त मेट्रिक की परीक्षा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती थी. मेट्रिक की परीक्षा में मिलने वाले गुणों के आधार पर प्रत्येक विद्यार्थी की भविष्य की राह निश्चित होती थी. उस वक्त बोर्ड में टॉप करने वाले 30 विद्यार्थियों की लिस्ट वर्तमानपत्र में छप कर आती थी. जिसे मेरिट लिस्ट कहा जाता था. मेरिट में आना एक बहुमान समजा जाता था. हमारे वक्त मेट्रिक परीक्षा में श्री ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए. उसने हमारी स्कूल, शहर में टॉप करने के साथ ही बोर्ड की मेरिट लिस्ट में चौथे नंबर पर स्थान प्राप्त किया. हमारे दुसरे मित्र प्रशांत ५१% लेकर सेकंड क्लास में पास हो गये.    इसके बाद श्री ने इंजीनियरिंग में एडमिशन कर ली और उसने अपनी बी. ई. मेकॅनिकल और  इलेक्ट्रिकल की डिग्री पूर्ण कर ली. यहाँ पर भी उसने अपेक्षा अनुरूप यूनिवर्सिटी में टॉप किया. आगे चल कर उसको मुंबई की एक नामांकित कंपनी में नोकरी मिली. अपनी होशीयारी और मेहनत के दम पर उसने आगे चल कर १० साल के अन्दर ही प्रोडक्शन मेनेजर की पोस्ट हासिल कर ली.  खुद का फ्लैट, कार लेने के बाद उसने शादी कर ली. इधर प्रशांत ने जैसे तैसे कॉमर्स में एडमिशन कर ली. लेकिन वह जब सेकंड इयर में था तब उसके पितः बीमार होने की वजह से घर की सभी जिम्मेदारी उसके कंधो पर आ गयी. घर का बड़ा होने की वजह से छोटे भाई की पढाई और घर का खर्चा चलाने के लिए उसने अपना कॉमर्स छोड़ दिया और अपने पिता की शॉप को संभालने लगा.

कुछ साल बाद श्री ने अपनी नोकरी छोड़ कर अपना बिजनेस शुरू किया ऐसा मुझे पता लगा. उसे किसी इंजीनियरिंग प्रोडक्ट की एजेंसी मिली थी. अचानक बिजनेस की तरफ श्री का यह रुख मुझे कुछ अचंबित करने वाला लगा. हमारे मध्यम वर्ग के परिवार में नोकरी को ज्यादा अहमियत दी जाती है शायद इस वजह से.

एक बार श्री मुझे उसका ऑफिस दिखाने लेकर गया. ऑफिस एकदम पोश था. ऑफिस केबिन में ए. सी. लगा था. बहार में एक सुन्दर रिसेप्शनिस्ट थी. श्री एकदम सूट, बूट में ऑफिस आता जाता था.   वह अपनी कार से एकदम रुबाब में आता था.

इधर प्रशांत के बारे में मुझे पता चला , उसने कुछ नया बिजनेस शुरू किया था. उसने मुबई के थोडा बहार एक वर्क शॉप सुरु किया था. अपने छोटे भाई को किराना शॉप की जिम्मेदारी देकर प्रशांत ने यह नया बिज़नेस शुरू किया था. अचानक किराना शॉप से हटकर कुछ नया कदम उसने उठाया था. मुझे जानकर थोडा अचंबा हुआ. क्योंकि मेरे जानकरी के मुताबिक उसे वर्क शॉप का कोई अनुभव नहीं था. वह मुझे उसकी पुराणी व्हेस्पा स्कूटर से खाने का टिफिन लेकर कभी कभी वर्कशॉप में जाते हुए दिखता था. उसके कपडे और उसकी दिनचर्या देखकर उसका कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा है ऐसा मुझे लगा. इसी बिच कभी कबार हम हमारे घर के पास ही एक काफी शॉप काफी पिने बैठ जाते थे. वहा की फ़िल्टर काफी लाजवाब थी इस लिए.

कुछ दिन बाद अचानक सुनने में आया श्री ने अपना बिज़नेस बंद कर  दिया. मैने जाकर उससे पूछा तो उसने बिज़नेस में लोस हुआ यह बताया. वह नोकरी की खोज में यह सुनने आया. पर अचानक उसके बारे में एक बात सुनकर मुझे धक्का लगा. श्री ने प्रशांत की वर्क शॉप में जनरल मेनेजर की पोस्ट ज्वाइन कर ली थी. हमारे क्लास का पढाई में सबसे पीछे रहने वाला वह लड़का जिसने हमारे क्लास के सबसे होशियार लड़के को आज जॉब पर रखा. यह बात मुझे बहोत अजीब लगी. पर जब से श्री ने प्रशांत का वर्क शॉप ज्वाइन किया तबसे उसका बिज़नेस तेजी से बढ़ने लगा. श्री के आने से उसकी कंपनी में बहोत सारे बदलाव आने लगे. प्रशांत ने अपनी कंपनी प्रायव्हेट लिमिटेड कर ली और श्री को मैनेजिंग डायरेक्टर की पोस्ट दे दी. प्रशांत के वर्क शॉप की तरक्की जोरो से होने लगी थी. प्रशांत ने अपने पिता का पुराना घर तुड़वा कर वहा चार मंजिला पॉश ईमारत बनवाई. मर्सडीज कार ली. पुराणी व्हेस्पा स्कूटर से घुमने वाला प्रशांत आज मर्सडीज से घूमने लगा. एक बड़े बिज़नेस के रूप में अपनी पहचान बनाई. इसके बावजूद आज भी वह मेरे लिए पुराना प्रशांत था. आज भी हम उसी काफी शॉप में बैठकर काफी पिते थे.

एक दिन ऐसेही प्रशांत और मै काफी पिने बैठे थे तभी श्री की बात निकली.

प्रशांत भी श्री की तारीफ करते नहीं थकता था वह मानता था उसके आने की वजह से आज उसकी तरक्की हो पाई है. इस बार सब्जेक्ट श्री के बिज़नेस को लेकर था. मेरी ज़हन में यही सवाल घुमते रहता था, श्री ने बिज़नेस क्यों बंद किया. मैंने प्रशांत से इस विषय पर बात की. तो उसने कहा क्योंकि उसे 1000×1000  यह फार्मूला पता नहीं था. बिज़नेस का यह फार्मूला मेरे पिता ने हमें बचपन में ही सिखा दिया था. वो बोलता रहा.  मेरे पिताजी केवल सातवी कक्षा तक पढ़े थे. लेकिन उनका यह फार्मूला सही साबित हुआ.

मैंने प्रशांत से पूछा यह कैसा फार्मूला है?   मुझे जरा ठीक से समजा.

उसने कहा, मेरे पिताजी हमेशा कहा करते थे बच्चा जब पैदा होता है उसके जिंदगी के पहले 1000 दिन, मतलब लगभग ३ साल बहोत महत्वपूर्ण होते है. वो बच्चा इन  तीन सालो में ही, सही मायनों में प्रगति करता है. मतलब सबसे पहले वो करवट लेता है, कुछ दिन बाद पेट के बल लेटने लगता है, पेट के बल घसरने लगता है, घुटनों के बल आगे बढ़ता है, उंगली या किसी चीज का सहारा लेकर खड़ा रहता है, फिर चलने लगता है, भागने लगता है तोतली भाषा में बात करने लगता है. इसी समय बच्चे की तबियत पर ज्यादा असर होता है, वो ज्यादा बीमार रहने लगता है, उसे बुखार आना, सर्दी, खासी,इन्फेक्शन होंने का धोका होता है. दात निकलते समय तकलीफ होती है. इसी समय पर उसे अलग अलग लसीकरण दिया जाता है. पोलिओ का डोस दिया जाता है. उसकी केयर की जाती है. प्रशांत बता रहा था. मै भी बचपन में बहोत बीमार रहता था ऐसा मेरी माँ बताती थी. लेकिन बच्चा बार बार बीमार पड़े तो उसे कोई मार नहीं डालता.  मैंने पूछा , लेकिन इसका श्री के बिज़नेस से क्या सम्बन्ध यही सवाल मुझे सता रहा था.

“ मेरे पिताजी हमेशा कहा करते थे जो बच्चा 1000 दिन जी गया वो आगे 1000 महीने जी लेगा मतलब 84 साल.  ज्यादा जीवन जीने का श्रेय हमारे तिन साल में हुए लालन पालन पर निर्भर करता है. मेरे पिताजी इस फोर्मुले को 1000 X 1000 यह फार्मूला कहते थे. यही फार्मूला हमारे बिज़नेस पर भी लागु होता है. प्रशांत ने कहा.  ”

वो कैसे ? मैंने पूछा.

‘ जब कोई भी नया बिज़नेस शुरू किया जाता है वह बिज़नेस अभी पैदा होने वाले बच्चे के समान  होता है. पहले 1000 दिन बहुत महत्वपूर्ण होते है.  हालांकि इस अवधि में कारोबार बढ़ता है, लेकिन इसी अवधि के दौरान व्यापार में कई समस्याएं आती है.  कई बाधाओं का सामना करना पड़ना है। इस समय के दौरान, आपको फ़साने वाले धोखाधड़ी  करने वाले लोग  मिलते हैं. आपके प्रतिस्पर्धि आपको नष्ट करने की कोशिश की करते है. इसके अलावा, आपको  सहायता करने वाले लोग भी इसी  समय में मिलते हैं. अब मुझेही देखो! जब मैंने वर्क शॉप  शुरू करने का फैसला किया, तो पिताजी  ने एक शर्त रखी, किसी भी हालत  में 1000 दिनों के भीतर वर्क शॉप बंद नहीं करना। जैसे भी हो  जारी रखना . मेरा शुरुवात में बहोत बुरा हल हुआ. मुझे वर्क शॉप के बारे में  कुछ भी पता नहीं था. लेथ किसे कहते है. मिलिंग मशीन किसे कहते है , ग्राइंडर का इस्तेमाल कैसे करते है. मुझे कुछ समज नहीं आ रहा था.  ट्राबे मशीन तो इसके पहले मैंने सपने में भी नहीं देखा था. जिस पार्टनर के साथ काम शुरू किया था उसने मुझे धोका दे दिया. जो वर्कर्स थे वो बेकार निकले. वर्क शॉप में चोरी बहोत होती थी. धोकेबाजी तो कई बार मेरे साथ इस दौरान हुई. कई बार ऐसा लग रहा था किस जाल में फस गया. लेकिन वर्क शॉप 1000 दिन चलाने का पिताजी से वादा किया था. आज तुम देख ही रहे हो उसके साथ क्या हुआ. अब हमारी 1000 दिन की अवधि समाप्त हो गई है. और अब हम 1000 महीनों की और जा रहे है. मेरे पिता की दुकान की भी यही कहानी है। पहले 1000 दिनों में दुकान चलाने में मेरे पिता को बहुत नुकसान हुआ था. आज हमारी दुकान को 55 साल पूरे हो गए  है. हमें यकीन है कि हमारी दुकान  और 30 साल तक आसानी से चलेगी.  मेरे भाई ने अब दुकान को बदल दिया है। अब हमारी दुकान भव्य स्टोर  में बदल गयी  है और जल्द ही इसे मॉल में बदल दिया जाएगा! “प्रशांत ने कहा , थोड़ी देर रुक कर फिरसे बात करने लगा.

‘ श्री जब पहली बार मुझे मिलने आया था मैंने उससे केवल उसके बिजनेस के बारे में जानकरी ली और बिजनेस कैसा चल रहा है यही पूछा था’ उसकी बातो से मुझे पता चला उसका बिजनेस अच्छा चल रहा है. पर मेरे खयाल से उसके कूछ गलत निर्णयों की वजह से उसे बिज़नेस में लोस हुवा. इसी वजह से उसने घबरा कर बिजनेस बंद कर दिया.  मेरे पिताजी के शब्दों में अगर कहे तो उसने 1000 दिन होने से पहले ही बच्चे को मार दिया. उसने अगर 1000 दिन  किसी तरह उस बिज़नेस को चलाया होता, तो यक़ीनन वो कामयाब होता. और उसका बिजनेस 1000 महीने चलता. उसमे पेशंस की कमी है यह बात मेरे समज में आ गयी. प्रशांत ने कहा.

हम कोफी ख़तम करके बहार निकले उसने मुझसे विदा ली.  उसके जाने के बाद मेरी जहन में 1000 X 1000 यह फार्मूला घूम रहा था.

जो बात प्रशांत के सातवी कक्षा तक पढ़े लिखे पिता को पता थी वही बात ग्रेजुएट, डबल ग्रेजुएट , पोस्ट ग्रेजुएट, डॉक्टरेट और यूनिवर्सिटी टोपर किये हुए लोगो के समज में नहीं आती यह बात मेरे लिए अभी भी एक पहेली है.

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