अंधा बना सकती है Mobile की Blue Light. कुछ आदते बदलो.

Blue Light

जो किरणे हमारे मोबाइल और बहोत सारे इलेक्ट्रोनिक उपकरण जो है उनसे निकलती है उसे Blue Light  किरणे कहते है. हमारी रोजमर्रा की Life में Technology का दखल काफी बढ़ गया है. बल्ब, ट्यूबलाइट और Entertainment Devices के रूप में Electricity ने हमारी Life को आसान और मनोरंजक तो बनाया है.लेकिन ऐसे ही Gadgets से आने वाली रोशनी हमारी सेहत पर बुरा असर भी डाल रही है.

इसमें भी बड़ी चिंता का सबब Blue Light  बन गई है. Gadgets का अंधाधुंध इस्तेमाल करने से लोग अपनी आंखों की रोशनी भी गंवा सकते हैं. इनसे बचने के तरीकों के बारे में आज हम जानेगे क्या बरतनी चाहिये सावधानी.

Blue Light Artificial का Attack

सूरज से आने वाली नीली रोशनी में तो हम हमेशा ही रहे हैं, लेकिन Electronics Devices से निकलने वाली Blue Light को लेकर चिंता बढ़ गई है.

आजकल LED, CFL,Tab, TV और Computer Screen जैसे कई Gadgets, Blue Lights के स्रोत बन गए हैं.

इनकी रोशनी में ज्यादा समय तक रहने से हमारे Retina में Photo receptors को नुकसान पहुंच सकता है.

Photo receptors हमारी आंख में प्रकाश के प्रति संवेदनशील हिस्सा होता है. इनको नुकसान होने से लोग अंधे भी हो सकते हैं.

Blue Light क्या है?

प्रकाश के Spectrum में Ultraviolet,  Infrared और दृश्य किरणें होती हैं.

Blue Light दृश्य किरणों का हिस्सा होती है. इसमें सबसे ज्यादा Energy वाली Wavelength होती है.

Blue Light सूरज की रोशनी से पूरी होने वाली हमारी जरूरत का हिस्सा भी है.

यह हमें Alert रहने, याददाश्त बनाए रखने और तरोताजा महसूस करने में मददगार होती है.

मनोचिकित्सक अपने मरीजों को Sun Therapyकी सलाह देते हैं.

दूसरे खतरे भी हैं.

Blue Light के संपर्क में ज्यादा वक्त तक रहने से केवल आंखों की रोशनी पर ही असर नहीं पड़ता, बल्कि दूसरी समस्याएं भी हो सकती हैं.

शोधकर्ताओं ने पाया है कि प्रकाश से मानव शरीर में Harmon’s के स्राव, Heart Rate, Alert रहने की क्षमता, नींद, शरीर के तापमान के साथ जीन पर भी असर पड़ता है.

कुछ अन्य प्रयोगों में पाया गया है कि Blue Light से शरीर का तापमान और Heart rate में इजाफा हो सकता है और नींद प्रभावित हो सकती है.

गहरी है  Blue की मार.

 लोग जानते ही हैं कि Ultraviolet किरणें आंखों और त्वचा के लिए नुकसानदेह होती हैं.

Ultraviolet किरणें आंखों के सामने वाले हिस्से तक पहुंचती हैं और ये कैटरेक्ट यानी मोतियाबिंद के लिए जिम्मेदार होती हैं.

Blue Light में आंखों के पिछले हिस्से तक पहुंचने की क्षमता होती है, जिससे Retina क्षतिग्रस्त हो सकता है.

Blue Light के संपर्क में ज्यादा रहने पर आंखों की मांसपेशियां उसी तरह कमजोर पड़ सकती हैं, जिस तरह उम्र बढ़ने पर हो जाती हैं.

Mobile Browsing में भी खतरा.

सोने से पहले अपने मोबाइल फोन पर Browsing करना बहोत लोगो की आदत बन गई है.

कमरे की Light Off करने के बाद तुरंत सोने के बजाय मैं Mobile Browsing किए बिना बहोत लोगो को चैन ही नहीं पड़ता.

  हालांकि इस आदत से आंखों पर असर पड़ता है.

लेकिन वो Ignore कर देते है.

इस आदत को ज्यादा दिनों तक दोहराने से एस्टिगमैटिज्म (कॉर्निया के आकार में बदलाव) हो सकता है.

हिफाजत के इंतजाम.

फोन में आजकल कई ऐसे ऐप्स हैं और डेस्कटॉप और कंप्यूटर स्क्रीन के लिए कई डिवाइसेज हैं.

 जिनसे आप ब्लू लाइट का एक्सपोजर घटा सकते हैं.

ये ऐप स्क्रीन से ब्लू लाइट को हटा देते हैं और लगभग सीपिया लुक देते हैं.

हालांकि इससे भी अहम यह है कि लोग सोने से पहले के कम से कम दो घंटे में डिवाइसेज का उपयोग न करें.

हर वक्त फोन पर अवलेबल रहना जरूरी नहीं.

दिन के कामकाज की प्लानिंग इस तरह करें कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले से फोन चेक करने की जरूरत न रहे.

सोने से पहले अपने मोबाइल इंटरनेट वाई-फाई को स्विच ऑफ कर दें ताकि नोटिफिकेशंस से आप डिस्टर्ब न हों.

 अपने बिस्तर के पास फोन न रखें, इससे आपको सुबह अलार्म बजने पर उठने में मदद मिलेगी.

हर वक्त फोन पर अवलेबल न होने की आदत खुद भी डालें और अपने करीबियों को भी बताएं.

टीवी या लैपटॉप पर आंखें गड़ाए रहने के बजाय सोने से पहले किताब पढ़ें.

टीवी, लैपटॉप, डेस्कटॉप आदि को बेडरूम से बाहर कर दें.

टेक डिवाइसेज के उपयोग में सावधानी.

 कई ऐसे मोबाइल ऐप्स हैं, जो स्क्रीन से ब्लू लाइट हटा देते हैं.

बेडरूम के लिए रात में हल्की रोशनी चाहिए तो रेड लाइट यूज करें.

अपने फोन और स्क्रीन की ब्राइटनेस मिनिमम रखें.

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