Sanitary Napkin making Story of Original PADMAN: Arunachalam Muruganantham

अक्षय कुमार की फिल्म Padman Movie अभी चर्चा का विषय है. आखिर अक्षय कुमार की इस फिल्म में PADMAN का जो किरदार निभाया गया है. क्या वो किसी के जीवन की स्टोरी है? यह प्रश्न मन में आ सकता है. PADMAN movie में जो किरदार अक्षय कुमार ने निभाया है उस आदमी का नाम Arunachalam Muruganantham.

इनकी जीवनी के ऊपर यह social फिल्म बनायीं गई है. तो चलिए जानते है उस असली हीरो के बारे में. Arunachalam Muruganantham एक  innovator और social entrepreneur भी है. उन्होंने low cost में सेनेटरी नेपकिन manufacture किया है. महिलाओ के लिए उन्होंने गाँव गाँव में जाकर menstrual hygiene movement को चलाया है. महिलाओ में पीरियड के समय सेनेटरी नेपकिन का इस्तेमाल करना और सेनेटरी नैपकिन का manufacturing कम लागत में करना यह उनके movement का उद्देश है. 

Padman

सेनेटरी नैपकिन बनाने का आईडिया पहली बार एक दशक पहले उन्हें आया. जब उन्होंने अपनी वाइफ को एक डर्टी क्लॉथ (ख़राब कपड़ा ) अपने पीछे छुपाते हुए देखा. उनको बादमे यह पता चला उनकी वाइफ पीरियड के दौरान यह कपड़ा इस्तेमाल करती है. उनकी इंटरव्यू के दौरान कही बार उन्होंने इस बात का जिक्र किया. जब उन्होंने उस कपडे को देखा तो वो इतना डर्टी था के वो उस कपडे से अपनी स्कूटर पोछना तक पसंद नहीं करते. तब उन्हें पता चला उनकी वाइफ जैसेही कितनी महिलाये ऐसे डर्टी क्लॉथ का इस्तेमाल करती होगी.

पीरियड के बारे में खुलकर बात करना भी यह एक असभ्य समजा जाता है. ऐसी जगह जा जा जाकर उन्होंने अपने menstrual hygiene movement को चलाया है. उनकी जिज्ञासा और मेहनत का फल है जो आज वह बहोत ही सस्ते कीमत में पैड बनाते है. और उसके लिए उन्होंने खुद की मशीन बनाकर उसका पेटेंट कराया है. गाँव कसबे में जाकर महिलाओ को अपने काम के बारे में जानकारी देकर उन्होंने वहा पैड बनाने के काम में महिलाओ को के लिए एक नए रोजगार की पहल शुरू कर दी है. आज दुनिया उन्हें PADMANके नाम से जानती है.

Arunachalam Muruganantham  एक कान्वेंट स्कूल में 1979 को चौथी कक्षा तक पढ़े है. जब उनके पापा की मृत्यु हुई तब उसके तीन महींनो बाद पैसो के अभाव में उनके परिवार वालो ने उनका नाम कान्वेंट स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में दाखिल  कर दिया. उनकी माता एक खेत में केवल 7 रुपये दिन के वेतन पर काम करती थी. उन्होंने अपनी स्कूल की पढाई दसवी कक्षा में छोड़ दी और एक वर्क शॉप में दरवाजे,ग्रिल्स और स्टेरकेस बनाने का काम शुरू कर दिया. उस वर्कशॉप में अपने परिवार और दो छोटी बहनों को संभालने के लिए सात साल तक काम किया.    

 साल 2000 में  Muruganantham ने सेनेटरी नैपकिन बनाने  के हिसाब से US कम्पनीज के सेनेटरी नैपकिन पर रिसर्च किया.

जब उन्होंने सेनेटरी नैपकिन को खोल कर देखा तो उन्हें पता चला वह कॉटन है, जो मल्टीनेशनल कंपनी इस्तेमाल कर रही है. इसीलिए उन्होंने अपना पहला एक्सपेरिमेंट कॉटन के साथ किया लेकिन , उनको बाद में पता चला कॉटन लिक्विड को नहीं सोक सकता.

जब उन्होंने कॉटन का पहला नैपकिन बनाया वह अपने पत्नी को इस्तेमाल करने दिया और फीडबैक के लिए पूछा. जब उनकी पत्नी ने कहा यह नैपकिन एकदम बेकार है और इससे तो अच्छा वो कपड़ा है, तो वह मायूस हो गये.

उनको लगा एक फीडबैक से काम नहीं होगा.  Muruganantham ने मेडिकल collage की लड़कियों को नैपकिन दिया. उनको लगा फ्यूचर डॉक्टर  है तो वो फीडबैक देने में शर्माएगी नहीं.  जब उन्होंने फीडबैक पूछा तो लड़किया फीडबैक देने में शरमा रही थी. तब उन्होंने कुछ फॉर्म्स छपवाकर फीडबैक लेने के लिए मेडिकल स्टूडेंट लड़कियों को दिए. एक दिन जब वे फॉर्म कलेक्ट करने गये तब दो लड़किया फीडबैक फॉर्म तुरंत में कुछ भी लिखकर उन्ही के सामने फ़ास्ट में फीडबैक फॉर्म भरने लगी. उन्हें लगा इस तरह का फीडबैक मुझे नहीं चाहिए इस वजह से उन्होंने अपना रिसर्च बंद कर दिया. 

 इसके बाद उन्होंने सेनेटरी नपकिन का खुद ही इस्तेमाल करने का फैसला लिया. वो बताते है, अपने अंडरवियर में नैपकिन रखकर फूटबाल के ब्लैडर में बकरी का ब्लड भरकर कमर को बांद दिया और एक पाइप लगाकर एक हात से ब्लैडर को टच करके ब्लड नैपकिन पर गिराते हुए चलते थे. पर यह तकनीक भी कुछ खास काम नही आई.

आखिर कार उन्होंने हारकर एक आखरी फैसला लिया जिसमे उन्होंने मेडिकल collage की छात्राओं को इस्तेमाल किये गए नैपकिन को एक कोने में एक पॉकेट में कलेक्ट करने को कहा. उन्होंने वह सभी नैपकिन को कलेक्ट किया और अपने घर के पिछले हिस्से में नेपकिन खोलकर अपना रिसर्च शुरू कर दिया.

वो बताते है” जब मेरी माँ ने मुझे यह सब करते देखा वह जोर से रोने लगीं और मेरा बेटा पागल हो गया ऐसा कहकर चिल्लाने लगी.” उसके बाद  वह मुझे छोड़कर मेरी बहन के घर रहने चली गयी.

उनके इस चक्कर में पत्नी पहले ही छोड़ कर जा चुकी थी और अब माँ भी छोड़ कर चली गई इसीलिए खाना बनाना और रिसर्च के साथ बाकि काम करना भी इनके लिए मुश्किल पैदा करने वाला समय था.

रिसर्च के बाद उन्हें पता चला मल्टीनेशनल कंपनी जो मटेरियल इस्तेमाल करती है वह कॉटन नहीं सेल्यूलोस था. इसी लिए उन्होंने cellulose सैंपल को US से इम्पोर्ट कर लिया.  उन्होंने कहा ‘ US से मुझे एक थिक cellulose शीट मिली, जब मैंने उस शीट को हात में पकड़ा मै आश्चर्य चकित हो गया किस तरह से इस शीट से नेपकिन बनाई जा सकती है. एक दिन मैंने उस शीट को फाड़ दिया और देखा वह शीट फाइबर से बनी थी. शीट को फाड़कर उसको फाइबर में तबदील किया जा सकता है. अब मुझे पैड बनाने के लिए मशीन की जरुरत थी. ‘

US में जो प्लांट मौजूद है उनको बनाने में कम से कम चार करोड़ का खर्चा आएगा. और मै इतना खर्चा नहीं कर सकता था. मैंने पैड बनाने के तकनीक को जाना और एक सिंपल मशीन को बनाया जो वही काम करती थी जो बड़े मशीन से होता पर यह मशीन एक रूम के स्पेस में आ जाती.  Muruganantham बता रहे थे,

आज उनका वर्कशॉप जयश्री इंडस्ट्री के नाम से सेनेटरी नैपकिन को बनाने वाली मशीन होल सेल में बनाती है.  उन्होंने अभी तक 200 डिस्ट्रिक्ट में इस मशीन को supply किया है पुरे भारत में. 

इस बिज़नस से वो बहोत पैसा कमा सकते थे पर उन्होंने अपने कुछ नियम बनाये है जिसमे वो केवल अपने मशीन को supply करते हुए महिलाओ के लिए इस माध्यम से रोजगार की निर्मिती करते है. उनका लक्ष केवल पैसा कमाने का न रहकर महिलाओ में रोजगार के माध्यम से बदलाव लाना है.

 उनका कहना है एक महिला दुसरे महिला के साथ ही माहवारी (menstruation) के बारे में खुल कर बात कर सकती है. इसी लिए उन्होंने सेनेटरी नेपकिन बनाने के लिए महिलाओ को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया. एक रूम के जगह में मशीन को लगाकर महिला अपने सभी काम संभालकर पैड आसानी से इस मशीन से बना सकती है. उनका लक्ष है महिलाओ को खुदकी रोजगार निर्मिती करके सक्षम बनाना. और देश में menstrual hygiene movement को बढाकर महिलाओ को जागृत करना.

“उनका लक्ष केवल केवल लोगो को पैसा कमाकर देना यही नहीं है ऐसा प्रोजेक्ट देना जिससे प्रोजेक्ट के कारन पैसा आता रहे. जिसमे वह अपना मशीन सेट अप देकर उसे चलाने  का प्रशिक्षण देकर  महिलाओ को पैसा कमाने का तरीका बताते है. “

 Muruganantham ने अपना पहला सेनेटरी नैपकिन बनाने का प्रोजेक्ट सेटअप उनके घर कोइम्बतुर में ही 2005 को लगाया.   उसके बाद उन्होंने अपने प्रोजेक्ट को बढ़ाते हुए उत्तराखंड के सरिया गाँव में 212 वा प्रोजेक्ट लगाया. साल 2006 में उन्होंने अपना पहला यूनिट All India Women Organisation देहरादून  को दिया. उनके सभी एक्सपर्ट्स दुनिया भर में जाकर लोगो को प्रशिक्षित करते है. उन्होंने अपने मशीन की कभी भी advertise नहीं की केवल एक दुसरे को बताकर ही मार्केटिंग की है. उनका कहना है एक आर्गेनाईजेशन को 50 यूनिट देने से अच्छा है एक यूनिट देकर चार महिलाओ को प्रशिक्षित करना और उनके लिए रोजगार के अवसर देना.

वे cellulose को US और मेडिकल क्लॉथ को जर्मनी से मंगवाते है. Sterilizing Machine में UV tube का इस्तेमाल होता है, जिसमे पैड को कुछ देर के लिए तैयार होने से पहले रखा जाता है, उसे Netherlands से मंगवाया जाता है. जो row मटेरियल बहार उपलब्ध है वो बहोत सस्ता होता है, लेकिन उसे इम्पोर्ट या एक्सपोर्ट करने के लिए IEC (Import Export code ) लाइसेंस लगता है.  जो मेरे पास है,  Muruganantham बताते है,

Read: क्या रोज पढ़ने से होते है फायदे, जानिए 10 बड़े फायदे, क्या जानते हैं आप ?

Read: अंधा बना सकती है Mobile की Blue Light. कुछ आदते बदलो.

30 दिनों में 22 दिनों तक वो बाहर जाकर महीने में 5 यूनिट इनस्टॉल करते है. उससे उनकी 60,0 00 से 70,000  रुपये की आमदनी हो जाती है. एक यूनिट को ऑपरेट करने के लिए चार महिलाओ को रोजगार मिलेगा. और उससे एक दिन में 800 से 1,000 सेनेटरी नेपकिन बनाये जा सकते है . एक लाख यूनिट पुरे भारत में लग जाये मतलब 10 लाख रोजगार गारंटी के साथ निर्माण होंगे. उन्होंने कहा.

2006 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी मद्रास ने उन्हें उनके खोज के लिए सम्मानित किया. 2009 में उन्होंने नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की आयोजित नेशनल बिएन्निअल कम्पटीशन में अपने खोज को लेकर जीत हासिल की, उनकी टेक्नोलॉजी 1 लाख 40 हजार (रॉ मटेरियल के साथ ) में आती है. उन्हें NIF के तरफ से माइक्रो वेंचर इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस स्कीम के तहत 8 लाख का लोन मिला है जिसमे उन्हें 12 परसेंट का इंटरेस्ट रेट देना है.

हरियाणा के सभी 21 जिल्हो में कम से कम एक यूनिट उन्होंने लगवाया है. उड़ीसा  और  नार्थ ईस्ट में अभी तक कोई यूनिट नहीं लगा है. मुरुगनन्थम ने बताया.

अभी कुछ महीने पहिले उन्होंने अपना यूनिट कैलिफ़ोर्निया में बेचा जो Massachusetts Institute Technology में लगाया गया है. उन्होंने गर्व से कहा. इन्ही मशीन को केन्या, नाइजीरिया, श्री लंका और बांग्लादेश में कुछ ही दिनो में लगाया जा रहा है.

बहोत ज्यादा मात्रा में मशीन को एक्सपोर्ट करने से अच्छा है, जैसे अफ्रीका से  आने वाले लोगो को मशीन बनाना Muruganantham सिखाते है. एक बार यूनिट बन जाये बाद में वो उनको सेनेटरी नेपकिन बनाने के प्रशिक्षण देते है. इससे मशीन को एक्सपोर्ट  करने का cost कम होता है. केवल एक यूनिट भेजकर बाकि यूनिट को उसी कंट्री में बनवाया जाता है. इससे मशीन सस्ते में बनायी जा सकती है.   

इस तरह से PADMAN Muruganantham ने अपना काम जारी रखा है . आपको इस स्टोरी से समज में आया होगा उन्हें PADMAN क्यों कहा जाता है. तो यह थी स्टोरी ओरिजिनल PADMAN की. 

आपको कैसे लगी कमेंट में जरुर बताये.

Read: बिजनेस करना है तो यह कहानी जरुर पढ़े. 1000X1000 फार्मूला

Read: बच्चों को Internet और smartphone की Addiction से कैसे दूर रखें.

News Reporter
I am a Computer Engineer, Working with a reputed Company. I am a Youtuber and Professional Blogger. working with Number of Blogs. this blog is helping people for technical tricks and tips.

One thought on “%1$s”

  1. priyada waldekar says:

    very nice story…!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *